महाराष्ट्र की राजनीति और शिवसेना की पुत्र नीति!

राजनीति में जो जनता को दिखता है वह कभी भी नहीं होता!

उद्धव ठाकरे बार-बार 50-50 बोलकर अपने पुत्र हेतु मुख्यमंत्री के पद को प्राप्त करने का गुहार लगा रहे हैं। यहां तक कि उन्होंने कैमरे पर आकर यह कहकर कि मैं झूठा नहीं हूं एक तरह से अमित शाह को झूठा कह दिया।

भाजपा की तरफ से देवेंद्र फडणवीस ने अपनी प्रेस वार्ता में स्पष्ट कहा कि उन्होंने कई बार उद्धव ठाकरे से फोन पर बात करने की कोशिश की पर बात नहीं हुई। इससे यह भी स्पष्ट है कि उनके अलावा किसी और ने उधव ठाकरे को मनाने की कोशिश नहीं की।

2014 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी अपने बलबूते पर लड़ी थी और सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बाद में शिवसेना ने उसे समर्थन दिया था लेकिन पूरे 5 साल शिवसेना का व्यवहार पूरी तरह विपक्षी पार्टी का था। भारतीय जनता पार्टी के फैसलों को और नेताओं के ऊपर टीका टिप्पणी करने से शिवसेना ने कतई गुरेज नहीं किया। सच पूछो तो पूरे भारत में अगर कांग्रेस के बाद कोई पार्टी सबसे मुख्य रूप से मुखर रूप से भारतीय जनता पार्टी कि आलोचक थी तो वह शिवसेना ही थी।

अच्छी नीति वही होती है जिसमें नीति बनाने वाले का हाथ किसी को दिखाई नहीं देता। भारतीय जनता पार्टी में आखरी दिन तक चुपचाप शिवसेना के तेवर देखें और राज्यपाल को जाकर मना कर दिया कि हमारे पास संख्या बल नहीं है अतः सरकार नहीं बना पाएंगे।

शिवसेना के संजय रावत मीडिया के सामने कैमरे पर बोल रहे थे कि उनके पास 170 विधायकों का समर्थन है। पर जब राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए बुलाया तो कोई समर्थन पत्र प्रस्तुत नहीं कर पाए। ऐसा तब हुआ जबकि संजय रावत कई बार शरद पवार से मिल चुके थे और यह अविश्वसनीय है कि उन्होंने 170 विधायकों के समर्थन का दावा बिना शरद पवार से बात किए मीडिया के सामने ऐसे ही कर दिया होगा। परंतु अगर ऐसा हुआ है तो संजय रावत और शिवसेना बहुत ही अपरिपक्व राजनीतिज्ञ है।
शिवसेना से सोनिया सेना तक:शरद पवार ने अच्छा खेल खेला। पहले शिवसेना को विश्वास दिलाया कि उनकी सरकार बन सकती है। शिवसेना बड़बोले पन में बिना समर्थन पत्र प्राप्त किए सरकार बनाने चली थी।

एक अटकल यह भी है कि बिहार के एक रणनीतिककार ने उधव ठाकरे को यह समझाया की शिवसेना महाराष्ट्र में कभी भी 75 सीटों से बज्यादा नहीं पाई। अगर ठाकरे परिवार का कोई मुख्यमंत्री बन जाता है तो वह भी फड़नीस की तरह अगले 5 साल में मशहूर नेता बन जाएगा। इस तरह शिवसेना अपनी घटी हुई संख्या को बढ़ा सकती है।

अटकल यह भी है कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा और मोदी की प्रचंड लहर के सामने झुकते हुए शिवसेना ने लोकसभा और विधानसभा में सीटों का समझौता कर लिया लेकिन जब भाजपा की सीटें कुछ कम रह गई तो शिवसेना की दबी हुई इच्छा प्रचंड हो गई।

बहराल अब राष्ट्रपति शासन लगने के बाद इन तीनों गुटों के पास खूब समय है। यह सरकार बनाएं। इन तीनों के लिए मिलजुल के सरकार बनाना सिर्फ इज्जत बचाने की जरूरत नहीं है वरन् आर्थिक लाभ का भी अवसर है। समस्या इस आर्थिक लाभ के बंटवारे का फार्मूला तैयार करने की है जिसमें समय में लग रहा है। बंदरबांट आसान नहीं होती। समय लगता ही है। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उद्धव ठाकरे के पुत्र को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलेगी?

भारतीय जनता पार्टी के लिए इन तीनों गुटों की नई सरकार बनना और फिर आपसी फूट के चलते उसका गिर जाना फायदेमंद है। इस प्रकार महाराष्ट्र में जहां त्रिकोणीय या षटकोणिय मुकाबला होता है वहां पर अगला चुनाव एक आर-पार की लड़ाई होगी। ऐसी आर पार की लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी की सफलता ज्यादा गहरी होती है क्योंकि मतदाताओं के सामने सिर्फ दो ही विकल्प रह जाएंगे जिससे भाजपा को लाभ मिलेगा।

पूरे घटनाक्रम से यह प्रतीत होता है की इस बाजी में भाजपा एक दीर्घकालिक रणनीति के हिसाब से चल रही है और शरद पवार दशक सोनिया गांधी व उधव ठाकरे अपनी बढ़ती उम्र के कारण सत्ता में बने रहने के लिए बेचैन है। विदित हो कि महाराष्ट्र आर्थिक रूप से भारत का सबसे संपन्न राज्य है।

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