भारत क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी से बाहर।

भारत ने 16 देशों के क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं बनने का फैसला लिया हैक्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी में 10 आसियान देशों के अलावा 6 अन्य देश ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं। यह देश दुनिया की आधी जनसंख्या का घर है और दुनिया का ४० प्रतिशत व्यापार यहीं होता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार ‘समझौते का मौजूदा स्वरूप बुनियादी भावना और मान्य मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह जाहिर नहीं करता है. यह मौजूदा परिस्थिति में भारत के दीर्घकालिक मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक रूप से समाधान भी पेश नहीं करता है।’इस समझौते में शामिल देशों को एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स कटौती समेत तमाम आर्थिक छूट देनी होगी। लेकिन समझौते के मसौदे में नॉन-टैरिफ प्रतिबंधों को लेकर कोई भरोसेमंद वादा शामिल नहीं है। इस प्रकार के प्रतिबंधों से चीन ने पहले ही भारत की कंपनियों का चीन में व्यापार करना मुश्किल कर रक्खा है।भारत का १० आसियान देशों और चीन के साथ पहले ही मुक्त व्यापार समझौता किया हुआ है जिसमें पिछले एक साल में भारत का वित्तीय घाटा 105 बिलियन डॉलर का रहा है।इसके अलावा मलेशिया और इंडोनेशिया ने अभी भी भारत को सिर्फ आधा ही बाजार उपलब्ध कराया है जबकि वह भारत के पूरे व्यापार का लाभ उड़ाते है।विदित हो क्रय शक्ति के मामले में भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थ्यवस्था है ओर इस समझौते के बाद उसका बाजार इन १६ देशों के लिए खुल जाता परंतु यह सभी देश क्रय शक्ति के मामले में कमजोर है ओर यह अपने बाजार को भारतीय कामगारों या सेवा क्षेत्र के लिए पूरी तरह से खोलने को तैयार नहीं थे। चीन भले ही विश्व की दूसरी बड़ी अर्थवयवस्था हो पर उसका ६० प्रतिशत व्यापार एक्सपोर्ट पर आधारित है। यानी उसका घरेलू बाज़ार भी बड़ा नहीं है ओर इसलिए वह कर की दरे काम कर के दूसरे कानूनों के तहत अपने यहां व्यापार करने में रुकावटें खड़ी करता रहता है। भारत कई साल से चीन पर दवाइयां तथा वाहन उद्योग के लिए मुश्किलें काम करने का असफल प्रयास करता रहा है।सच तो यह है कि इन १६ देशों की यह उम्मीद की भारत बिना किसी अपेक्षा के ओर अपने पिछले तजुर्बे को भूल कर अपना ३ ट्रिलियन डॉलर का घरेलू बाजार इनके लिए खोल देगा, मुंगेरी लाल के हसीन सपने जैसा था।भारत की समझौते से हटने की घोषणा इन देशों पर ठंडे पानी की तरह पड़ी है ओर सकते में इन्होंने यह भी नहीं बताया कि क्या यह देश आपस में यह समझौता करेंगे?यह पूरा प्रसंग भोलू की बकरी की पञ्चतन्त्र की कहानी की याद कराता है बस इस कहानी में भोलू अपनी बकरी बचा कर घर भाग आया।

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