पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों ने चौथे दिन शुक्रवार को अपने आंदोलन के साथ जारी रखा

बंगाल के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों और कई निजी अस्पतालो में नियमित स्वास्थ सेवाओं में बाधा।

पश्चिम बंगाल में जूनियर डॉक्टर मंगलवार से आंदोलन कर रहे थे, सरकारी अस्पतालों में अपने लिए सुरक्षा की मांग कर रहे है।

कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक मरीज के परिजनों द्वारा कथित तौर पर उनके दो सहयोगियों पर हमला करने और गंभीर रूप से घायल होने के बाद यह हड़ताल शुरू हुई। कुछ डॉक्टरों का कहना है कि मार पिटाई करने वाले परिवारजन नही बल्कि ममता बनर्जी की पार्टी के गूंदे थे निनकी संख्या 200 से ऊपर थी।

हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने काम फिर से शुरू नहीं किए जाने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती वे आंदोलन करते रहेंगे।

आंदोलन के कारण:

हाल के दिनों में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा के मामलों की संख्या – शारीरिक और मौखिक – बढ़ी है। एम्स दिल्ली ने अकेले 2013 और 2014 में कार्यस्थल की हिंसा के 32 मामलों की सूचना दी। प्रमुख संस्थान में आकस्मिक वार्ड हिंसा के अधिकतम मामलों को देखा। विशेषज्ञों का कहना है, मरीजों के परिवारों द्वारा कथित अन्याय हिंसा का प्रमुख कारण आकस्मिक भावुकता था। अन्य कारण थे जैसे कि: रोगी की देखभाल में देरी, भीड़भाड़, नियुक्तियों और जांच के लिए लंबा इंतजार, सुरक्षा गार्डों की कमी और स्वास्थ्य कर्मियों के बीच कौशल की कमी।

अन्य देशों में भी समस्या:

अमेरिका भर में 3,500 से अधिक आपातकालीन चिकित्सकों के हालिया सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग आधे डॉक्टरों ने नौकरी पर शारीरिक हमला झेला था। 2011 में, चीन में 10-प्रांत के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि पिछले 12 महीनों में आधे से अधिक चिकित्सकों से मौखिक रूप से दुर्व्यवहार किया था। एक तिहाई को खतरा था और 3.4% रोगियों द्वारा शारीरिक हमला वाकई में किया गया था।

कुछ देशों ने इस तरह की हिंसा को रोकने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया है। अमेरिका में कम से कम 30 राज्यों ने कानून पारित कर दिया है, जिससे यह अस्पताल कर्मियों पर हमला करने के लिए एक गंभीर अपराध है। ब्रिटेन में, दुर्लभ मामलों में, रोगियों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य ट्रस्ट से बाहर रखा गया है, जिसका अर्थ है कि उन्हें केवल आपातकालीन उपचार प्रदान किया जाएगा। दूसरी ओर, चीन परिवारिक चिकित्सकों की अवधारणा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, ताकि हल्की बीमारियों वाले लोग अस्पतालों में न जाएं, इस प्रकार भीड़भाड़ को कम करना होगा।
दिल्ली का मुहल्ला क्लिनिक भी इस दिशा में एक अच्छा प्रयास हो सकता था पर भ्रष्ट ओर अकुशल संचालन के कारण वह सफल नही हुआ।

भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने भी एक कानून बना कर डॉक्टरों की सुरक्षा की वकालत की है। यह ट्वीट पड़े:

अब आगे क्या:

बंगाल से निकली यह डॉक्टरों के आंदोलन की आग पूरे देश मे फैल गई। सभी जगह सरकारी डॉक्टर सिर्फ आकस्मिक सहायता प्रदान कर रहे है। सभी काम काज ठप्प पड़े है। भारत के स्वास्थ मंत्री ने डॉक्टरों से अपील की है कि वह सांकेतिक रूप से आंदोलन कर व काम पर लो जाए। मंत्री जी ने सभी राज्यो को भी पत्र लिखकर आग्रह किया है कि डॉक्टरों को सुरक्षा मुहैया कराई जाए।

इस बीच बंगाल में डॉक्टरों ने ममता बनर्जी से मिलने की मांग ठुकरा दी है और यह मांग की है कि वह पहले माफी मांगे। विदित हो कि ममता ने कल डॉक्टरों को सुरक्षा की ओर से आश्वस्त करने के बजाय 4 घंटे में आंदोलन खत्म करने की दी थी। यह वही मुख्य मंत्री है जो कुछ महीने पहले एक पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी के विरोध में खुद धरने पर बैठ गई थी।

आज वह उसी पुलिस की दुहाई देके कह रही है कि नोकरी पर तो पुलिस वाले भी घायल हो जाते है तो डॉक्टर घायल हो गए तो क्या।

आगे आगे देखिए होता है क्या। इतिहास गवाह है कि जब शासक सिर्फ राजनीतिज्ञ ही रह जाता है, जनता का बहुत नुकसान होता है।

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